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Bihar News बिहार में चल रहा है बड़ा खेल, अधिकारियों ने करोड़ों का सामान किया गबन, मामला खुला तो मचा हड़कंप

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Bihar News : मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला मजिस्ट्रेट (DM) डॉ. चंद्रशेखर सिंह ने एडीएम की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी गठित की थी। कमेटी ने बिलों की गहन जांच की और एक महीने तक भौतिक सत्यापन किया, जिसके बाद बड़ा खुलासा हुआ
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Bihar News : पिछले साल अक्टूबर 2024 में पटना जिले में गंगा के किनारे बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए बनाए गए राहत शिविरों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। जांच में 2.98 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की बात सामने आई है।

दीघा मरीन ड्राइव से लेकर पटना सदर प्रखंड तक गंगा किनारे 14 जगहों पर राहत शिविर बनाए गए थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी (डीएम) डॉ. चंद्रशेखर सिंह ने एडीएम की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी गठित की थी. कमेटी ने एक महीने तक बिलों की गहन जांच की और भौतिक सत्यापन किया, जिसके बाद यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ.

जांच में क्या हुआ खुलासा?
आपको बता दें कि दावा किया गया था कि राहत शिविरों पर 2 करोड़ 72 लाख रुपये और भोजन पर 50 लाख रुपये खर्च किए गए. लेकिन जांच के बाद शिविर के लिए भुगतान के लिए सिर्फ 16 लाख रुपये और भोजन के लिए 8 लाख रुपये की अनुशंसा की गई. यानी कुल 2.98 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी पकड़ी गई है. इसके अलावा रजिस्टर में इस बात का भी स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं था कि शिविरों में प्रतिदिन कितने लोगों ने भोजन किया।

पीड़ित परिवारों का पूरा ब्योरा दर्ज करना अनिवार्य था, लेकिन संचालकों ने मनमाने तरीके से लोगों की संख्या और भोजन की कीमत दर्शा दी। यही नहीं, बिलों में टेंट और पंडाल के लिए जो क्षेत्रफल (वर्ग फीट) दिखाया गया, वह मौके पर उपलब्ध जगह से कई गुना अधिक था। भौतिक सत्यापन में यह स्पष्ट हो गया कि दावा की गई जगह मौजूद ही नहीं है, जिससे फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। मालूम हो कि हर शिविर में जिला प्रशासन का एक कर्मचारी तैनात था, लेकिन कई जगहों पर कर्मचारियों की रिपोर्ट और एजेंसी के दावों में कोई समन्वय नहीं था।

पहले भी सामने आ चुकी हैं अनियमितताएं
यह पहली बार नहीं है कि पटना जिला प्रशासन के खर्च में अनियमितता पकड़ी गई हो। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी खर्च के ब्यौरे में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आई थीं। तब चार सदस्यीय समिति ने 124 करोड़ रुपये के बिलों की जांच की थी, जिसमें से मात्र 32 करोड़ रुपये ही सही पाए गए थे। यानी 92 करोड़ रुपये का गबन सामने आया था। इस बार भी इसी समिति ने राहत शिविरों की जांच की, जिसमें एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार उजागर हुआ।

सवाल जो बचे हैं
इस घोटाले से कई गंभीर सवाल उठते हैं। पहला, जब हर शिविर में जिला प्रशासन का एक कर्मचारी तैनात था, तो इतने बड़े पैमाने पर गबन कैसे हुआ? क्या कर्मचारी और एजेंसियां ​​इसमें शामिल थीं? दूसरा, बिलों में इतनी बड़ी अनियमितता शुरुआत में ही कैसे स्वीकृत हो गई? क्या इसमें उच्च स्तर के अधिकारी भी शामिल हैं? 3 इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी या सजा क्यों नहीं हुई?

बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकार इस मामले में क्या कदम उठाएगी? जिलाधिकारी डॉ. चंद्रशेखर सिंह ने कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, पिछले अनुभव बताते हैं कि बिहार में ऐसे मामलों में कार्रवाई अक्सर धीमी होती है।

2005 के बाढ़ राहत घोटाले में संतोष झा को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। इस बार भी देखना होगा कि क्या यह जांच सिर्फ कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रहती है या दोषियों को वाकई सजा मिलती है।

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Author: News Patna Ki

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